पथ-प्रदर्शक

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‘बच्चों का देश’ के पथ-प्रदर्शक एवं प्रेरणा-स्रोत रहे हैं श्री मोहनलाल जैन जिन्हें प्यार से सब मोहन भाई के नाम से जानते हैं. बचपन की एक घटना ने उन्हें औपचारिक शिक्षा से वंचित कर दिया था. स्कूल का पहला दिन ही उनके लिए पुरे जीवन का पाठ बन गया. जब उन्होंने स्कूल में प्रवेश किया तो देखा, गुरुजी एक बच्चे को बेरहमी से पीट रहे थे. वे अन्दर नहीं गए और घर लौट आए, फिर कभी स्कूल नहीं गए. इसी पाठ से प्रेरित हो कर मोहन भाई ने जीवन पर्यन्त शिक्षण शैली में बदलाव एवं बच्चों के मनोविज्ञान आधारित सर्वांगीण विकास के लिए अथक प्रयास किए. उन्होंने मोन्तेस्सोरी, गिजुभाई एवं गांधीजी द्वारा सुझाई गई शिक्षण पद्धतियों के आधार पर अनेक संस्थान स्थापित किए. मोहन भाई का मानना था कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं और उनके मनोविज्ञान को समझ कर ही उनका समुचित विकास सुनिश्चित किया जा सकता है.


एक बाल मनोविज्ञान आधारित बाल पत्रिका उनका प्रिय स्वप्न था जो ‘बच्चों का देश’ के उद्भव के साथ पूरा हुआ. मोहन भाई कहते थे कि अब तक उन्होंने स्थाई संस्थान बनाये थे लेकिन ‘बच्चों का देश’ एक चलता-फिरता संस्थान है और इसके माध्यम से भारत के हर एक बच्चे तक पहुँचने का सपना वे देखा करते थे. बच्चों के सर्वांगीण विकास के दृष्टिगत किए गए उनके अतुलनीय कार्यों के लिए मोहन भाई को भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान ‘राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार’ से सम्मानित किया. नैतिक मूल्यों के हिमायती मोहन भाई को ‘अणुव्रत पुरस्कार’, ‘गांधी सेवा पुरस्कार’, ‘महावीर-महात्मा सम्मान’, ‘द लीजेंड इन एजुकेशन’, ‘समाज सेवा पुरस्कार’, ‘ विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान’, ‘लोक सेवी सम्मान’ जैसे अनेक सम्मानों से नवाजा गया.


24 अप्रैल 2014 को 95 वर्ष की उम्र में मोहन भाई का जयपुर में निधन हो गया. वे अपने पीछे परिवार व साथियों की लम्बी कतार छोड़ कर गए हैं जो उनके द्वारा जलाई गई मशाल को प्रज्ज्वलित रखेंगे.